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Showing posts from November, 2017
 चलना बहुत है... अभी तो जागा हूँ, चलना बहुत है। पूरा कहाँ आधा हूँ, अभी ढलना बहुत है। ये शहर जो नया-नया लग रहा है। अभी इसके अन्दर पलना बहुत है। अभी तो लब हिले हैं, कहना बहुत है। कुछ सुन रहा हूँ, अभी सुनना बहुत है। अभी उम्र के गुज़रते पन्नों को भरना बहुत है। कुछ लिख रहा हूँ, अभी लिखना बहुत है। अभी तो जागा हूँ, चलना बहुत है...
जब इंसान बनाया ही था, तो लगे हाथ मज़हब भी बना दिया होता, थोड़ी देर सही दुरुस्त बनते, अब जो यहां मज़हबी बाज़ार बन गए हैं, कौन किस मज़हब का है, कुछ समझ नहीं आता, सूरत बदल कर कोई कुछ भी बन जाता है, ज़बां पर मिलावटी फ़िज़ूल की बातें हैं, एक - दूसरे का हिस्सा सब खाते हैं, लेकिन खुद को ईमानदार बताते हैं, जाने कैसे हैं लोग जिनमें इंसानियत बची नहीं, फिर भी इंसान कहलाते हैं...