'एक रात का दुःख !!'
कभी-कभी हम उस जगह खड़े हो जाते हैं, जहाँ से हमें अपनी सारी ज़िन्दगी भर का दुःख और गम उसके दुखों से कम लगने लगता है जो उस वक़्त हमारी आखों के सामने डरा हुआ और सेहमा हुआ सा खड़ा है। कुछ ऐसा ही लम्हा था जब मैंने उसे देखकर ऐसा महसूस किया।
दुःख क्या कभी एक रात के लिए ही आता है?
नहीं, ये तो उम्र भर साथ रहता है। हाँ-हाँ सुख और दुःख आते-जाते रहते हैं, ये तो बहुत पुरानी कहावत है।
बहरहाल यहाँ मैं अपने दुःख या तक़लीफ़ की बात नहीं कर रहा हूँ।
मुंबई में रहते हुए कई साल हो गए। इतने भी नहीं कि मैं कोई बूढ़ा हो गया हूँ। ''अनगिनत लोग अनगिनत सपने और अनगिनत कहानियाँ: यहाँ हर दिन आते हैं, बनते हैं-टूटते हैं, और लिखी जाती हैं।'' मैं कोई बॉलीवुड का डायलॉग नहीं चिपका रहा।
रोज़ लोकल ट्रेन लेकर ऑफिस से घर आते हुए डिब्बे में चढ़ने और उतरने की पायदान के एक तरफ खड़ा अपनी मनपसंद प्लेलिस्ट सुनते हुए चांदनी रात में सफ़ेद बादलों को निहारना मुझे बेहद पसंद है। उस दिन भी चाँद हर दिन की तरह बहुत खूबसूरत लग रहा था। उसपर सर-सर करती हुई तेज़ हवा मेरे चेहरे पर ठंडी ताज़गी बिखेर रही थी। ये अनुभव ऐसा होता है कि आप कितना ही क्यों न थके हों सारी थकान कुछ ही पलों में काफूर हो जाती है। मगर ये सुखद अनुभव अब ख़त्म होने वाला था क्योंकि 'घाटकोपर से नाहूर' की दूरी ही कितनी है। मुंबई में रहने वाले जानते होंगे।
अचानक तालियाँ बजने की आवाज़ कानों में पड़ते ही अनायास ही मेरी नज़र उस ओर मुड़ गई। मेरी आँखें एक हिजड़े पर पड़ी और ठहर गई जो तालियां बजाता हुआ सामने की तरफ से मेरी तरफ़ चलती ट्रेन में अपने कदम संभाल के चलता चला आ रहा था। इन्हें हिजड़ा या छक्का कहना मुझे कभी अच्छा नहीं लगता है लेकिन इस समाज में हरदिन इन्हें इसी नाम दर्शाया जाता है। इनके नाम की तो गालियां देने से भी पहले कई बार सोचते हैं लोग। किसी को हिजड़ा बोल के तो देखो क्या हाल करता है तुम्हारा। मैं अक्सर लिखते वक़्त इन्हें 'दरमियाना'' शब्द से ही सम्बोधित करता हूँ। जिसका मतलब बीच का होता है। लेकिन इस कहानी में मैंने वही नाम उपयोग किया है जिसे ये समाज बहुत अच्छे से समझता है।
अंग्रेजी में ट्रांसजेंडर शब्द सुनके थोड़ा अच्छा लगता है। शायद इस सो-कॉल्ड सभ्य समाज में ट्रांसजेंडर बोल कर उन्हें थोड़ी रेस्पेक्ट दी जाती है! खैर ये तो बस कहने की बात है। मैं कुछ नया तो नहीं कह रहा हूँ। सबको पता है। ये तो प्रकृति है इसपर किसी का बस नहीं चलता कि कौन कैसे पैदा होगा। मुझे इसके बारे में ज्यादा जानकारी देने की जरुरत नहीं है।
साड़ी-ब्लाउज़ पहने हुए कम उम्र का वयस्क लग रहा था रंग भी गोरा लेकिन शरीर दुबला पतला था। शायद कांजुरमार्ग से चढ़ी थी। (यहाँ मैं उसके पहनावे के हिसाब से उसे स्त्रीलिंग के साथ सम्बोधित कर रहा हूँ।) डब्बे में अचानक शोर-शराबा कुछ ज्यादा ही होने लगा था। कुछ लौंडे-लपाड़ी भी इसी डिब्बे में शायद कांजुरमार्ग से ही चढ़ गए थे। इन्हें मैं लौंडे-लपाड़ी ही कहना चाहूंगा क्योंकि हर एक ने लफंगो जैसे कपड़े पहन रखे थे। एकदम बॉलीवुड की फिल्मों जैसे। ऐसे लौंडे जुहू बीच में पत्थरों के पीछे अपनी जोड़ियों के साथ चिपके हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। मुंह से गुटकों की बदबू इनकी सबसे अच्छी पहचान है।
इतने में वो मेरे पास पहुंची और उसने मेरी बांह को धीरे से धक्का देकर कहा ''दे ना'' . मैंने अपने हाथ में पहले से ही निकाल के रखा हुआ २ रुपये का सिक्का उसे दे दिया। अक्सर मैं इन्हे देखकर पहले से ही पैसे निकाल के रख लिया करता हूँ देने के लिए। ऐसा इसलिए नहीं की मुझे उनपर बहुत दया आती है बल्कि इसलिए की मैं इनसे थोड़ा डरता हूँ, कहीं नाराज़ होकर मुझे श्राप दे दिया तो। मेरी समझदारी का आकलन इस बात से मत लगाइये, मुझमें इतनी समझ तो है। लेकिन क्या करें गाँव-देहात में पले बढ़े होने के कारण बचपन से यही सुनते आ रहे हैं। गाँव तो गाँव शहरों में भी ये भ्रांतिया आम हैं जो कभी-कभार मुझ पर हावी हो जाती हैं।
उसने मेरे सर पर हाथ फेरा आँखें बंद की और कुछ सेकंड के लिए दबी आवाज़ में कुछ बुदबुदाया और अगले दरवाज़े की तरफ आगे बढ़ गयी। मेरा स्टेशन नाहूर आ चूका था। ट्रेन जैसे ही धीमी हुई मुम्बईकर स्टाइल में मैं भी ट्रेन के पूरा रुकने से पहले ही उछल के उतर गया और सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगा। रात १२ बजने में अभी भी कुछ वक़्त बाकी था शायद ठीक से याद नहीं।
अचानक पीछे की ओर से किसी के चीखने की आवाज़ ने मुझे डरा दिया। ऐसा लगा कि कोई ट्रेन से गिर गया। ठीक उसी वक़्त बगल की ट्रैक से एक फ़ास्ट ट्रेन गुज़र रही थी। जिसके शोर ने माहौल में और डर पैदा कर दिया। हालांकि मुंबई में चलती ट्रेन से गिरना आम बात है। पीछे मुड़ते ही मेरी नज़र डरी हुई और सेहमी हुई उस हिजड़े पर पड़ी जिसे कुछ वक़्त पहले मैंने लोकल ट्रेन की अपने बोगी में देखा था। और उसके चारो तरफ वही लौंडे-लपाड़ी उसे घेरकर खड़े थे। जो उसी बोगी में थे। किसी लौंडे का हाथ उसके चुतरों पर तो किसी लपाड़ी का हाथ उसके उभरे हुए छाती पर रेंग रहा था। तीसरा लौंडा आगे से निचे उसकी साड़ी पकडे हुए खड़ा था। और चौथा उसकी पतली कमर की चमड़ियों को दोनों तरफ से सहलाते हुए खींच रहा था। आने जाने वाले उसके बगल से ऐसे गुज़र रहे थे, जैसे ये रोज़ की बात हो।
कुछ वक़्त के लिए मैं स्तब्ध खड़ा सब देखता रहा। समझ में नहीं आया क्या करूँ। तभी किसी के चिल्लाने की आवाज़ आयी ''ए छोड़ रे'' आवाज़ भारी थी लगभग ४५ से ५० साल के आदमी की। तभी दूसरी आवाज़ आयी ''ए लवड़े छोड़ रे'' ये किसी २० से २५ साल के युवक की आवाज़ थी। मुंबई में ये भाषा भी बहुत आम है जिसे सुनते ही उन्होंने उसे छोड़ दिया। इतने में ही ट्रेन ने चलना शुरू कर दिया और देखते ही देखते सारे लौंडे चलती ट्रेन में फिर से चढ़ गए।
लेकिन वो वहीं उसी स्तब्ध हालत में कुछ मिनटों तक खड़ी रही। उसने कभी सोचा भी नहीं होगा शायद उसके साथ भी कुछ ऐसा हो सकता है। वो लौंडे हवस से अवसादग्रस्त इंसानी गिद्ध थे शायद!
मैंने हमेशा हिजड़ों को या उनकी टोलियों को निडर, मजाकिया या सच कहूं तो अश्लील हरकतें करते कई बार देखा है। लेकिन आज उसकी हालत मुझे किसी रेप पीड़ित लड़की या औरत के समान लग रही थी। घबराहट से कांपते होंठ और उसकी आँखों से छलकते आंसुओं को मैंने देखा उस दिन। अचानक से मेरे जेहन में ये ख़याल कौंध गया कि उसने उन्हें अपनी उंगलियां फोड़ कर श्राप क्यों नहीं दिया।
उस रात उसके साथ जो कुछ भी हुआ मुझे उस बात का दुःख है। मेरे लिए शायद उस घटना का दुःख बस ''एक रात का दुःख'' हो मगर उसके दिल में ज़िन्दगी भर के लिए वो सदमा ज़िंदा रहेगा।
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